Friday, March 1, 2024

केदारनाथ कब खुलता है और कब बंद होता है

 

दोस्तो भारत की भूमि ऋषि-मुनियों की भूमिका कही जाती है । भारत अपनी संस्कृति और अपनी आस्था के लि पूरे विश्व भर में जाना जाता है और कई देश भारत के आस्था और संस्कृति का मान भी रखते हैं। दोस्तो भारत में कई ऐसे मंदिर हैं जो हमें भगवान के होने का एहसास कराते हैं वैसे तो भारत में स्थित मंदिर हमेशा से ही अपनी कलाकृति और अपने आकर्षण से लोगों को अपनी और आकर्षित करते रहे हैं। 

केदारनाथ कब खुलता है और कब बंद होता है

आज के पोस्ट में हम आपसे एक ऐसे ही मंदिर की बात करने जा रहे हैं   जहा पर जाना लगभग हर किसी का सपना होता है । दोस्तो हम बात करें। केदारनाथ मंदिर के । हिमालय पर्वत की गोद में बसा केदारनाथ धाम का यह मंदिर उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है । 


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केदारनाथ कब खुलता है और कब बंद होता है

जो भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सम्मिलित होने के साथ-साथ चारधाम और पंच केदार में सम्मिलित है। भगवान शिव के मंदिर को भारत के बड़े और महान मंदिरों में गिना जाता है दोस्तो ये मंदिर कई हजारों साल पुराना है। इस मंदिर के बारे में कई सारी कहावत है। प्रचलित हैं। दोस्तों हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में ऐसा उल्लेख किया गया है कि भगवान शिव जहां-जहां स्वयं प्रकट हुए थे वह स्थान ज्योतिर्लिंग क्या लाए थे उन 12 स्थानों पर एस्ति शिवलिंग को ज्योतलिंग के रूप में पूजा जाता है। 


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केदारनाथ मंदिर महाभारत से सम्बंध रखता हे? 

दोस्तों उत्तराखंड में श्री केदारनाथ मंदिर पर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पांच वा ज्योतिर्लिंग कहलाता है। श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की पौराणिक कथा महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त कर पांडवों से जुड़े है । इस कथा के अनुसार यह भी कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त कर पांडे व अपने परिवार वालों की हत्या के बाद से मुक्ति पाने के लिए भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, 


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लेकिन भगवान शंकर पांडवो को से नाराज थे जब पांडव शंकर भगवान के दर्शन के लिए काशी गए तो भगवान शंकर उन्हें नहीं मिला। फिर पांडव शंकर भगवान की खोज में निकल पड़े और शंकर भगवान को खोजते हुए हिमालय पर्वत पर जा पहुंचे। 


उन्हे शंकर भगवान वहां पर भी नहीं मिला। पांडवो से नाराज शंकर भगवान वहां से अंतर्ध्यान हो कर केदार में जा बसे ।  लेकिन पांडवो भी अपने जिद्द में पक्के थे। उनका पीछा करते-करते केदार पर्वत पर जा पहुंचे। और शंकर भगवान को ढूंढने लगे, परंतु शंकर भगवान बैल का रूप धारण करके आने पशुओं के झुंड में जा मिले । 


उस समय पांडवों का ऐसा संदेह हुआ कि भगवान शंकर इन पशुओं के झुंड में ही उपस्थित है। तभी भीम ने विशाल रूप धारण कर अपने विशाल पैरों को सामने के दो पहाड़ों पर फैला दिया। भीम के विशाल पैरों के बीच में से अन्य सभी गाय बैल तो निकल गए, परंतु बेल के रूप में शंकर जी भीम के पैर के नीचे से नहीं निकले और वहीं पर रुक गए । 


केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड में ही क्यों हुवा ? 

तभी भीम ने अपनी पूरी ताकत है। उस बैल को पकड़ लिया, लेकिन बेल धीरे-धीरे भूमि के अंदर समाने लगा। भीम ने अपने बल से बैल की पीठ को पकड़ लिया। भीम की इस अद्भुत ताकत और उनके श्रद्धा भक्ति देख भगवान शंकर ने पांडवों को दर्शन देकर उन्हें पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से बैल की पीठ की आकृति वाले पिंड के रूप में भगवान शंकर के केदारनाथ धाम में पूजे जाते हैं ।


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तो वहीं कई पौराणिक कथाओं के अनुसार हिमालय के केदार पर्वत पर महा तपस्वी विष्णु अवतार नारायण ऋषि ने तपस्या कर अपनी इस आराधना से भगवान शंकर को प्रसन्न किया और जब तपस्या से खुश होकर शंकर भगवान प्रकट हुए और नारायण ऋषि से एक वरदान मांगने को कहा तो नारायण ऋषि ने उनसे प्रार्थना की कि वह इस जगह पर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा बास करें ।


केदारनाथ मंदिर के बारे में पहले कोई नही जानता था ? 

दोस्तो जैसे आज हम केदारनाथ मंदिर में घूम सकते हैं, वहां के ज्योतिर्लिंग को देख सकते हैं, लेकिन प्राचीन समय में ऐसा नहीं था क्योंकि पहले किसी को पता ही नहीं था कि यहां पर केदारनाथ नाम का कोई मंदिर भी है । दोस्तो ये बात सुनकर आपको थोड़ी हैरानी होगी, परंतु यह बात बिल्कुल भी सच है।


दरअसल वैज्ञानिकों के अनुसार केदारनाथ का मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा था। लेकिन फिर भी वह सुरक्षित बचा रहा। 13 से 17 शताब्दी तक यानी 400 साल तक ये एक हेमू आया था, जिसमें हिमालय के बडा क्षेत्र बर्फ के अंदर चला गया था? 


देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक विजय जोशी ने कहा कि 400 साल तक केदारनाथ के मंदिर के बर्फ के अंदर दबे रहने के बावजूद मंदिर सुरक्षित रहा । लेकिन जब बर्फ पीछे हटी तो उसके हटने के निशान मंदिर पर मौजूद है और इन निशानों को मंदिर में बड़ी आसानी से आज भी देखा जा सकता है। 


केदारनाथ मंदिर का लंबाई , ऊंचाई और चौड़ाई ? 

दोस्तो केदारनाथ मंदिर करीब 50 फीट ऊंचाई 187 फीट लंबा 80 फीट चौड़ा है। इसकी दीवारें 12 फीट मोटे हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाए गए हैं। दोस्तों इस मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है मंदिर के निर्माण में भारी पत्रों को ऊंचाई से लाकर  उन्हें बारीकी से तलाशी कर मंदिर की शक्ल देना है। काफी कठिन काम था। 


केदारनाथ मंदिर पहाड़ों से घिरा हुआ है ? 

दोस्तों केदारनाथ धाम और मंदिर तीन तरह पहाड़ों से घिरा हुआ है। पहली तरफ करीब 22000 फुट ऊंचा पहाड़ है तो दूसरी तरफ 21600 फुट ऊंचा पहाड़ है, जिसे खर्च कुंड कहा जाता है और दूसरी तरफ 22700 फुट ऊंचा पहाड़ है, जिसे भरतकुंड के नाम से जाना जाता है। 


केदारनाथ मंदिर में पाए जाने वाले नदी ? 

दोस्तों यह सिर्फ तीन पहाड़ नहीं, बल्कि पांच नदियों का संगम भी है   ये नदिया मंदाकिनी मधु गंगा , खीर गंगा , सरस्वती , और सरन गंगा है । हालाकि दोस्तो इन नदियों में से कुछ को काल्पनिक माना जाता है  । इस इलाके में मंडांकी नदी ही विशेष तौर पर दिखाई देती है । 


केदारनाथ में जल प्रलय आने का कारण ? 

दोस्तो साल 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में आए सैलाब ने भारी तबाही मचाई थी। इससे कई लोगों की जान समेत कई इमारतों को भी नुकसान पहुंचा था। शिव जी के इस पावन धाम में जल प्रलय ने सब को हिला कर रख दिया था । दरशाल 13 जून से लेकर 17 जून के बीच उत्तराखंड में काफी  बारिश हुई थी । 


ये बारिश सबसे ज्यादा थे। इस दौरान वहां का चोराबारी ग्लेशियर पिघल गया था, जिससे मंदाकिनी नदी का जलस्तर देखते ही देखते बढने लगा । इस बढ़े हुए जलस्तर ने उत्तराखंड हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी नेपाल का बड़ा हिस्सा अपनी चपेट में ले लिया। तेजी से बहती हुई मंदाकिनी का पानी केदारनाथ मंदिर तक आ गया   ।


दोस्तो आपको यह बात जानकर बहुत ज्यादा हैरानी होगी कि मंदाकिनी नदी हमेशा से पूर्व की दिशा की ओर बहती है। लेकिन जब ये प्रलय आया तो मंदाकिनी नदी पश्चिम की ओर बहने लगे थे । ये देख कर उत्तराखंड के लोग और वहां के पंडितों ने कहा कि इस प्रलय को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि शंभू किसी बात से बहुत क्रोधित हुए हैं   


केदारनाथ में बादल फटने से कितने मौत हुए ? 

दोस्तो केदारनाथ में यह प्रलय ऐसा था कि लगातार पांच दिन बराबर एक ही धार से पानी बरसता रहा। ऐसा सालो साल पहले कभी नहीं हुआ था। इस प्रलय में 5000 से ज्यादा लोगों की जाने गईं और कई लोग लापता हो गए ।  सरकार ने आधिकारिक रूप से 4435 मृतकों के परिजनों को मुआवजा भी दिया था। 


लेकिन यह सिर्फ एक आंकड़ा था । और मरने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थे। बहुत से लोग तो ऐसे थे जिनके लास नहीं मिला। दोस्तो हमेशा से खूबसूरत दिखने वाले इस केदारनाथ घाटी का हो लिया इस से बदलेगा। किसी ने सोचा भी नहीं था। उस समय का मंजर ऐसा था कि प्रलय ने केदारनाथ को मौत की चादर से ढक दिया  और हजारों लाशे नदी में बह गए थे। 


आपदा के चौथे दिन केदारनाथ मंदिर के पास राहत दल पहुंचा तो वहां सैकड़ों लाशे पानी में तैरते मिले थे। इसके अलावा नदी में बस ट्रक और मकान बहते हुए देखा था। सोनपुर और सीतापुर में गाड़ियों पानी में तैर रहे थे, जो लोग जिंदा थे। वह बस जान बचाने के लिए किसी राहत दल का इंतजार कर रहे थे। तभी सरकार ने घाटी में फंसे हुए लोगों के लिए हेलीकॉप्टर सेवा दे । 


जेसे ही हेलीकॉप्टर घाटी में पहुंचा तो लोग हेलीकॉप्टर की तरफ हाथ हिलाकर जान बचाने के लिए चलाने लगे। जब पायलट ने किसी तरह लैंड किया तो कई लोग उनसे चिपक गए और बचाने की गुहार लगाने लगे। रामबाड़ा और केदारनाथ के बीच जंगल चट्टी में 500 के करीब लोग फसे थे। उन्हे बचाने के चक्कर में एक हेलिकॉप्टर भी वहां क्रश हो गया था। 


रामबाड़ा कहा पाता है? 

दोस्तों अगर आप आज तक केदारनाथ नहीं गए हैं तो आपको बता दें कि गौरीकुंड से केदारनाथ मंदिर तक 16 किलोमीटर की चढ़ाई में आधी दूरी पर एक जगह आती है जिससे रामबाड़ा नाम से जानते हैं। जिस दिन यहां पर बाढ़ आई थी, उसे रामबाड़ा में 5000 यात्रियों रुके हुए थे   इस जगह आज पूरी तरह शमशान है   ।


रामबाड़ा के बॉड में क्या लिखा है ? 

और यहां एक बैनर लिखा हुआ है जिस पर लिखा है मंदाकिनी के सैलाब में अंतर्ध्यान रामबाड़ा। इस यात्रा पद पर रह रह कर आएगी। तुम्हारी याद हमें उदास कर जाएंगे लेकिन हमें रोना नहीं है। आंसुओं के सैलाब में तुम्हें खोना नहीं है। 


ये उन लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा गया था जिन्होंने इस प्रलय में अपनी जान गवा बैठे थे । दोस्तो केदारनाथ में आए इस प्रलय के बहुत से धार्मिक कारण बताए गए थे। बताया जाता है कि केदारनाथ में अचानक बाढ़ का कारण धारी माता का विस्थापन रहा है। 


केदारनाथ में बादल क्यों फटा ? 

दरअसल उत्तराखंड से 15 किलोमीटर दूर कालिया अस्थान में धारी देवी का मंदिर है कई पंडितों द्वारा यह बताया जाता है कि ऐसी मान्यता है । कि धारी देवी की वहां पर स्थापना उत्तराखंड की रक्षा के लिए हुई है। लेकिन जून 2013 में प्रलय आने के कुछ समय पहले ही किसी सरकारी काम के चलते मूर्ति को थोड़ी देर के लिए वहां से हटाया गया था ।


लोगो का मान्यता है कि मूर्ति के हटने के कुछ घंटों बाद ही केदारनाथ में भारी तबाही मची थी दोस्तो धारी देवी के स्वरूप की हकीकत को कई डीवागो ने भी माना है। भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने भी एक सम्मेलन में इस बात को स्वीकार किया था कि धारी माता का मंदिर में स्थापित नहीं किया जाता तो केदारनाथ में प्रलय नहीं आते। 


तो दोस्तो इसके उपर आपके क्या सवाल है । आप हमे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं । ताकि हम भी आपके सवालों का ज़बाब जान सके । तो आज के लिए इतना हमारे साथ जुड़े रहने के लिए आप सभी को धन्यवाद ,,,,,,,,,,,


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